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रघुवंश प्रसाद: समाजवाद का बरगद जिसने मनरेगा जैसी योजना की नींव रखी

समाजवाद के आखिरी बरगद और बिहार के सबसे बड़े सादगी वाले नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का रविवार को निधन हो गया। वो इलाज के लिए दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उनका निधन हो गया। वो 74 साल के थे।
उन्हें पिछले दिनों कोरोना संक्रमण हुआ था। वो फेफड़े में इंफेक्शन से जूझ रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दो दिन पहले वेंटीलेटर पर रखा गया था।

उन्हें करीब एक सप्ताह पहले एम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। उन्हें जून के महीने में कोरोना संक्रमण हुआ था जिसके बाद भी उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। तब वो ठीक हो गए थे। वो बिहार के एक बड़े नेता माने जाते थे। हाल ही में उन्होंने राजद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने एम्स से ही अपना इस्तीफा राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को लिखा था। हालांकि लालू प्रसाद ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था। और कहा था कि वो कहीं नहीं जा रहे।

इसके बाद उन्होंने नीतीश कुमार को भी पत्र लिखा था। कयास लगाए जा रहे थे कि वो जल्द ही जदयू का दामन थामेंगे। रघुवंश प्रसाद का जन्म वैशाली में 6 जून 1946 में हुआ था। वो 74 साल के थे।

मनरेगा के जनक

राजनीतिक जीवन में बेबाक और बेदाग अंदाज में रहने वाले प्रखर समाजवादी नेता डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ‘मनरेगा’ योजना लागू कर अमर हो गए। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के संकटमोचक ब्रह्म बाबा उर्फ रघुवंश प्रसाद सिंह राजद का सवर्ण चेहरा थे। कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए-1) शासन काल में राजद कोटे से मंत्री बनाए गए थे।

23 मई 2004 से 2009 तक वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट में ग्रामीण विकास विभाग मंत्री रहे। इस बीच सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने रोजगार गारंटी कानून बनाने का प्रस्ताव दिया। इस कानून बनाने की जिम्मेदारी श्रम मंत्रालय को दी गई। लेकिन श्रम मंत्रालय ने इस कानून को बनाने को लेकर छह महीने में ही हाथ खड़े कर दिए। बाद में ग्रामीण विकास मंत्रालय को कानून बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

साइन्स ग्रेजुएट और गणित में मास्टर डिग्री वाली शैक्षणिक योग्यता वाले डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस कानून को बनवाने और पास कराने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि कानून को लेकर उनकी कैबिनेट के ही कई मंत्री सवाल खड़े कर रहे थे। कइयों ने तो इसे फिजुलखर्ची तक करार दिया। आखिर में समाजवादी पृष्ठभूमि के रघुवंश बाबू इस योजना के लिए सभी को साथ लाने में कामयाब रहे और 2 फरवरी 2006 को एक साथ देश के 200 पिछड़े जिलों में इस कानून को लागू किया गया। 2008 तक यह कानून महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना(मनरेगा) भारत के सभी जिलों में लागू की जा चुकी थी। इस कानून के तहत ग्रामीणों को 100 दिन की न्यूनतम रोजगार की गारंटी दी गई थी।

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